योग केन्द्र

योगासन एवं क्रियाएं

योग करना और रोग भगाना यह रोज देखने में आता है। अच्छे चिकित्सा केंद्र योग का खूब प्रयोग करते हैं। शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए कई प्रकार के योग पंद्रह बीस मिनट या एक घंटे तक हल्के-हल्के करने से रोगी को खूब लाभ मिलता है। हम इस पुस्तक में सरल योगों को कैसे करना वह अलग से लिख रहे हैं। सूर्या पफाउण्डेशन योग क्रम देखें। योगासन से कई नए एवं पुराने रोगों से मुक्ति मिलती है और शरीर स्वस्थ रहता है। आजकल योगासन का प्रचलन तेजी से चल पड़ा है। नयी पीढ़ी के युवा भी इसके लाभों से संतुष्ट एवं प्रभावित हैं। हर अंग पुष्ट होकर सहजता से कार्य करता है। योगासन में कुछ सावधनियों का पालन करना होता है जिसे प्रशिक्षित योगी से सीखा जा सकता है। भोजन के तुरंत बाद एवं उच्च रक्तचाप के रोगी को आसन नहीं करना चाहिए। कुछ खास-खास रोगों के रोगी के लिए कुछ आसन वर्जित भी हैं। हर आसन के बाद दो मिनट का श्वासन करना चाहिए |

कुंजल

तीन गिलास गुनगुने पानी को एक ही बार में जल्दी से पीते चले जाते हैं। कुछ कदम चलने के बाद कमर से लगभग 90 अंश पर झुककर खड़े हो जाते हैं और गले के अंदर दो उंगली डालकर उल्टी करने लग जाते हैं। बायें हाथ को पेट पर रखते हैं। वमन का प्रयास बार-बार करके सारा पानी बाहर निकाल देते हैं। कंुजल क्रिया के बाद 5-10 मिनट के लिए श्वासन में लेटना या विश्राम करना चाहिए। इससे अमाश्य की जलन, खट्टी डकारें ;हाइपर एसिडिटीद्ध, विषाक्त भोजन जैसे कष्टों से तुरंत आराम मिलता है। चेहरे पर मुंहासें, पफोड़े-पुफंसी निकलना, रक्त विकार, पित्त-कपफ की गड़बड़ी तथा मंदाग्नि आदि के कष्टों को दूर करने में यह क्रिया विशेष सहायक है। यह साधरण जल धेति हुआ। इसके अतिरिक्त वस्त्रा धेति भी उपयोगी है।

जल नेति

टोंटीदार लोटे में गुनगुना पानी भरकर घुटनों के बल बैठ जाते हैं। अब लोटे की टोंटी को अच्छी तरह से दाहिनी नाक के छिद्र में लगाना चाहिए और मुंह खोलकर बांयी ओर थोड़ा झुकना चाहिए। कुछ क्षण के लिए ज्यों ही सांस को रोका जाएगा, पानी दूसरी नाक से निकलना शुरू हो जाएगा। इसी तरह दूसरी नाक के छेद से भी करना चाहिए। एक-एक लोटा जल दोनों नासिका छिद्रों से निकालना चाहिए। जलनेति के समय मुंह से सांस लिया जाता है। कपालभाति और भस्त्रिाका करके नाक को अच्छी तरह सापफ कर लेना चाहिए। इससे नेत्रा-ज्योति और स्मरण शक्ति बढ़ती है। नजला-जुकाम, नाक, कान और गले के रोग दूर होते हैं। जल नेति करने के कई फायदे होते है | इसमें श्वसन प्रणाली ठीक होती | और हमारी रोग प्रतिरोधक शमता में बढोत्तरी होती है|

सूत्रानेति

लगभग 15-16 इंच लंबा थोड़ा मोटा सूत्रा या रबड़ लेते हैं। आगे का सिरा थोड़ा पतला कर एक नथुने में प्रवेश कराते हैं और दूसरा नथुना बंद कर लेते हैं तत्पश्चात् खूब जोर से पूरक करना चाहिए। ऐसा करने से सूत का भाग कंठ के पास आ जाएगा। तब उसे उंगलियों द्वारा बाहर खींच लेना चाहिए। अब दोनों सिरों को पकड़कर धीरे-धीरे आगे-पीछे करते हैं। इसी प्रकार दूसरे नथुने से भी करना चाहिए। इससे कंधे के उपर के सारे रोग दूर करने में सहायता मिलती है।

कपालभाति

कपालभाति के लिए पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंखें बंद कर लेनी चाहिए। पहले दाहिने नथुने से सांस लें और बायें से निकाल दें। पिफर बायें से सांस लें और दाहिने से निकाल दें। लोहार की धौंकनी की तरह शीघ्रतापूर्वक इस क्रिया को करना चाहिए। परंतु आरंभ में धीरे-धीरे ही करना चाहिए। इसके अतिरिक्त भी कुछ दवाविहीन चिकित्सा विधियां जैसे एक्युप्रेशर, एक्युपंचर, आस्टियोपैथी आदि को भी विद्वान प्राकृतिक चिकित्सा का ही भाग मानते हैं। गांधीजी ने राम नाम को भी महाऔषधि संज्ञा दी है। उपरोक्त विधियों को अनुभवी एवं प्रशिक्षित चिकित्सक की देख-रेख में ही किया जाना चाहिए। यहां सभी विधिया मात्रा सांकेतिक रूप से दी गई हैं और स्वयं करने पर पीड़ादायक भी हो सकती हैं।

भुजंगासन

• इस आसन से मेरूदण्ड लचीला,स्वस्थ व पुष्ट बनता है।
• इससे कब्ज दूर होता है।
• भूख बढ़ती है, बढ़ा हुआ पेट घट जाता है।
• स्त्रिायों के लिए यह आसन बहुत उपयोगी है।
• उदर से संबंध्ति रोगों विशेषकर जिगर व गुर्दों के रोगों में अति लाभकारी है।