"उपवास" स्वास्थ्य मंदिर द्वारा संचालित सेवाएँ


उपवास

उपवास को प्राकृतिक चिकित्सा की नींव माना जाता है। स्वेच्छा से भोजन से दूर रहना ही उपवास है। यह आंतरिक शुद्धिकरण की एक प्रक्रिया है जिससे आंतरिक अंगों को क्रियात्मक विश्राम मिलता है। उपवास कई तरह के होते हैं। ड्राई उपवास, द्रव उपवास, पफलाहार उपवास आदि। समय के हिसाब से अति संक्षिप्त (एक से तीन दिन का), लघु उपवास (सात दिन का), दीर्घ उपवास (सात से बीस दिन का), अति दीर्घ उपवास (बीस से अधिक दिनों का) आदि। उपवास काल में लगभग छः से आठ गिलास जल थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लिया जाना चाहिए। नींबू जल का भी प्रयोग किया जा सकता है। उपवास काल में प्रतिदिन प्रायः एवं सायं एनिमा लेना चाहिए। पूर्ण विश्राम, खुली हवा एवं सद् साहित्य का अध्ययन आदि करना चाहिए। उपवास को तोड़ना एक वैज्ञानिक कला है अन्यथा उपवास के लाभ से वंचित होना पड़ सकता है। यदि एक दिन का उपवास हो तो अगले दिन नींबू पानी लेकर उपवास समाप्त करते हैं। उसके बाद रसाहार एवं शाम को हल्का भोजन लेना चाहिए। दो दिन के उपवास में तीसरे दिन प्रातः रसाहार, शाम को पफलाहार तथा चैथे दिन हल्का भोजन लेना चाहिए। तीन दिन के उपवास में चौथे दिन फलों का रस अथवा सब्जियों का सूप, पांचवें दिन पफल एवं छठे दिन प्रातःकाल फल लेकर दोपहर को सब्जी एवं रोटी तथा शाम को चार बजे पुनः फल लेना चाहिए। इसके बाद साधरण भोजन प्रारंभ करना चाहिए। खाना पचने में भी शक्ति लगती है। रोगी खाना पचा नहीं सकता, उस समय उसे खिलाना जहर है। उसे केवल पानी पिलाया जाय तो वह ठीक हो जायेगा। गाय, कुत्ता व अन्य सभी पशु बीमार पड़ते ही खाना छोड़ देते हैं। इस उपवास कहते हैं।