रोग एवं प्राकृतिक उपचार

एनिमा

एनिमा का प्रयोग उपवास काल में एवं कब्ज आदि में पेट सापफ करके आंतों की शक्ति को बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसमें गुदा द्वार से बड़ी आंत में पानी भरा जाता है। एक एनिमा पॉट होता है जिसमें पानी भरा रहता है और एक रबर नली होती है, जिसका एक सिरा एनिमा पॉट या बर्तन से लगा रहता है तथा दूसरे सिरे पर थोड़ा तेल या वैसलीन लगाकर गुदा में सरका दिया जाता है। रोगी को पीठ के बल या बायीं तरपफ लिटाकर एनिमा दिया जाता है। पानी जा रहा हो तो हल्के हाथों से पेट को बायें से दायें सहलाते रहना चाहिए। एनिमा लेने के बाद थोड़ी देर टहलना चाहिए जिससे आंतों में जमा हुआ मल पूरी तरह से पानी में धुल जाये। यह मलाशय में जमा मल सापफ करने और कब्ज दूर करने में बहुत उपयोगी है। आंतों में पैरिस्टैलेटिक संचालन में सुधर होता है। यह उल्टियां, आंतों में जख्म, बवासीर और बुखार में लाभकारी होता है। आंतों में संक्रमण जैसे अमीबा, रुग्णता, कोलाइटिस, पेट के कीड़े आदि में नीम की पत्तियां उबालकर तैयार किए गए जल से लाभ होता है। सामान्यतः एक लीटर जल से एनिमा लेना पर्याप्त होता है।

महिला रोग

सामान्य रूप से भारतीय महिलाओं में रक्त में कैल्शियम और लौह तत्व की कमी हमेशा दिखायी देती है। जिसके मुख्य स्त्रोत हैं - सिंघाड़ा, तिल, कमल ककड़ी, मेथी, बथुआ, खजूर, पालक, दही एवं दूध्, रागी, सहजन के फली, पत्ता, फूल आदि। खाने में प्रोटीन, लौह, कैल्शियम एवं विटामिन युक्त भोजन-दूध् दही रागी, सहजन की फली, पालक तथा सभी पत्तों वाली सब्जियों, अंजीर, मुनक्का, खुमानी, सलाद, फल, हरी चटनी, धनिया व आंवला एवं चोकर सहित आटे की चपाती, मेथी, पालक, बथुआ और चौलाई आदि की सब्जियां भी दे सकते हैं। कारण • व्यायाम की कमी। • स्वतंत्राता की कमी • मानसिक तनाव

मोटापा

लक्षण • सामान्य से अधिक वजन हो जाता है। • परिश्रम का कार्य करने से श्वास पूफल जाता है| • हिम्मत की कमी आ जाती है और कुछ कर गुजरने की क्षमता का हास्य हो जाता है। • तुरन्त सोचने की शक्ति कम हो जाती है। इस प्रकार तन और मन दोनों से ही किसी परिश्रम साध्य कार्य करने से डर जाता है। • आलस्य रहता है और अधिक निद्रा आती है | • मन पर संयम नहीं रहता। इस प्रकार सामान्य से अधिक खाया जाता है। • रक्तचाप का उच्च होना। मधुमेह, दमा तथा संधिवात जैसे रोग हो सकते हैं। इसके साथ-साथ चेहरे का सौंदर्य भी चला जाता है। • शरीर बेडौल हो जाता है। कारण • परिश्रम न करना। • कार्बोहाइड्रेट, वसा एवं तला-भुना भोजन सामान्य से अधिक मात्रा में खाने से। • वंशानुगत, कभी-कभी यह पीढ़ी दर पीढ़ी भी होता है। • कब्ज के कारण कभी-कभी मोटापा कब्ज के रोगियों को भी हो सकता है। • मदिरा पान, पफास्ट पफूड एवं मैदे से बने भोज्य पदार्थों से भी मोटापा आता है। • महिलाओं में मोटापा गर्भ निरोध्क गोलियां लेने से भी आ जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा • संपूर्ण शरीर का वाष्प स्नान सप्ताह में दो-तीन बार देकर ठंडे जल से स्नान करें। • दोनों समय प्रतिदिन ठंडा कटिस्नान कराते हैं। पिफर टहलने के लिए भेजते हैं।

कान के रोग

लक्षण :- • कान में बहुत ही कष्टकारी दर्द होता है, • कान में उसके आस-पास सूजन और लाली का होना, • कान में आनज का दाना, पफोड़ा, पफुंसी अथवा सूजन के कारण कम सुनाई देना, • सिर में भारीपन होना, • कान से पीप अथवा पानी जैसे तरल का बहना, • कान से गुंजन की ध्वनि आना, • कान से दुर्गन्ध् आना, • कम सुनाई देना अथवा सुनाई ही ना देना, कारण :- • कान में चोट लगने, कुरेदने तथा पानी के भर जाने के कारण, • कान में मैल एकत्रित होकर सूख जाने के कारण, • कान में पफोड़ा-पफुंसी अथवा पफंगल इन्पफेक्शन के कारण, • कान में अनाज के दाने के पड़कर पफूल जाने के कारण, • बार-बार टॉन्सिल्स के उभरने के कारण, • दंत रोग के कारण, • ध्वनि प्रदुषण के कारण,

गले के रोग

लक्षण :- • गले में रुकावट व भारीपन का होना, • सांस लेने में कठिनाई का होना, • भूख का कम लगना, • कान के नीचे गले में शोथ का दिखाई देना, • ज्वर, सिर दर्द तथा पूरे शरीर में थकावट का होना, • जीभ को दबाकर देखने पर गले में सुपारी के आकार के बढ़े हुए टांसिल्स का दिखाई देना, • आवाज का बैठ जाना, • गले से बलगम अथवा श्लेष्मा का निकलना, • खांसी का होना, • सांस लेने में कठिनाई का होना, कारण :- • दूषित वायु, पानी, दूध्, अथवा अन्य पेय के द्वारा उत्पन्न संक्रमण के कारण, • मौसम परिवर्तन के कारण, • अधिक खट्टी बादी व ठंडी खाद्य वस्तुओं के सेवन के कारण, • में उत्पन्न दोष के कारण, • ज्वर, स्कारलैट ज्वर अथवा डिप्थीरिया आदि रोगों के कारण, • अधिक बोलने अथवा गायन के कारण, • उत्तेजक पदार्थों तथा मिर्चं मसालों के अत्यध्कि सेवन के कारण, • तैलीय भोजन के तुरन्त बाद ठंडे जल के सेवन से, • नाक, कान गले के रोगों की

नाक के रोग

लक्षण :- • आंख और नाक से स्त्राव का बहना तथा आंखों में लाली होना, • सांस लेने में कठिनाई तथा शरीर में थकावट महसूस होना, • आंखों और गले में भारीपन तथा दर्द होना, • रोग पुराना होने पर श्लेष्मा का गाढ़ा होकर नाक का बंद हो जाना, • आंखों की रोशनी का कम होना, • बालों का झड़ना तथा असमय सपफेद होना, • सिर दर्द बने रहना तथा सोते समय सीने में कष्ट होना, कारण :- • अधिक धूल, मिट्टी अथवा किसी भी प्रिय या अप्रिय गंध् के कारण, • कब्ज के निरन्तर बने रहने के कारण, • ऋतु परिवर्तन के कारण, • वर्षा ऋतु के कारण अथवा शरीर के आवश्यकता से कम तापमान के कारण, • पसीने की अवस्था में तुरन्त हवा अथवा ठंडे जल के सम्पर्क में आने के कारण, • वायु प्रादुषण के कारण, • नाक की हड्डी बढ़ने के कारण, • तला-भुना तथा बाजारी डिब्बाबंद भोजन,